जानिए पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से ज्यातिष के अनुसार सूर्य उपासना

0
FB_IMG_1741491324903

जानिए पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से ज्यातिष के अनुसार सूर्य उपासना

नौ ग्रहों में से सूर्य ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण ग्रह है जो व्यक्ति के जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात को प्रमाणित करता है कि सूर्य पर ही पूरा जीवमंडल आश्रित है और यही पृथ्वी पर पूरे जीवन चक्र को चलाने वाली मुख्य शक्ति है। यह जानना उचित होगा कि प्रचीन वैदिक शास्त्र में सूर्य को क्या स्थान दिया गया था।

वैदिक साहित्य में सूर्य को जीवनदाता और जीवनपालक कहा जाता है। “मत्स्य पुराण” के अनुसार, “आरोग्यम भास्करादिच्छेत” (सूर्य अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करने वाला है)। भारत के ज्ञानियों और संतों ने सूर्य की उपासना की कई विधियां बताई हैं। जिनमें से एक है “सूर्य नमस्कार”।

उगते हुए सूरज की पहली किरण को न सिर्फ मानव बल्कि अन्य पशुओं और वनस्पतियों की सेहत के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इस किरण में बीमारियां पैदा करने वाले तत्वों को खत्म कर अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करने की शक्ति होती है। “ऋगवेद” के अनुसार, उगते हुए सूर्य की पहली किरण हृदय रोग, पीलिया तथा अनीमिया आदि को ठीक कर सकती है। इसी प्रकार “अथर्ववेद” में भी सूर्य की इन किरणों को हृदय संबंधी बीमारियों तथा अनीमिया आदि रोगों से ग्रस्त व्यक्ति के लिए बहुत लाभदायक माना गया है।

यही कारण है कि वेदों में सूर्योदय के समय पूर्व की ओर मुख करके सूर्य की उपासना करने का बहुत महत्व बताया गया है। जब सूर्योदय होता है, उस समय व्यक्ति के सीने पर पड़ने वाली इसकी सीधी किरणें बहुत स्वास्थ्यवर्धक होती हैं। सूर्य की किरणें दिन के किसी भी समय इतनी प्रभावशाली और लाभदायक नहीं होतीं जितनी कि सुबह के समय होती हैं।

अथर्ववेद के नौंवें अध्याय में ऐसी 22 बीमारियों का उल्लेख है जो उगते सूर्य की किरणों से ठीक हो सकती हैं। इनमें से कुछ आम बीमारियां हैं- सिरदर्द, कान का दर्द, अनीमिया, सिर की बीमारियां, बहरापन, अंधापन, सभी प्रकार का शारीरिक दर्द, जोड़ों की जकड़न, सभी प्रकार का बुखार, पीलिया, पेट की बीमारियां, पॉयज़निंग, वात और पित्त के असंतुलन से होने वाली बीमारियां, गुर्दों संबंधी बीमारियां, हड्डियों, कार्टिलेज, आंतों, गुप्तांग, क्षय रोग, घावों, घुटनों, जांघों, रीढ़ की हड्डी संबंधी रोग, तथा कुष्ठ रोग आदि।

अथवर्वेद में आगे लिखा गया है कि सूर्य की किरणों में रहना अमृत के संसार में रहने के समान है। ऋगवेद में भी इस बारे में यही कहा गया है कि सूर्य की किरणें प्राणियों को लंबी आयु प्रदान करती हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार सूर्य अपने सात घोंड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश में पूर्व से पश्चिम की ओर गति करता है। सूर्य रथ के यह सात घोड़े इसकी सात प्रकार की किरणों के समान हैं। आधुनिक विज्ञान ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि सूर्य प्रकाश में सात रंगों की किरणों का सूमेल होता है जो सूर्य से पैदा होती हैं। इनमें से प्रत्येक रंग की किरण (VIBGYOR) में खास चिकित्सकीय गुण मौजूद होते हैं।

अथर्ववेद में बताई गई बहुत सी बीमारियां काफी साधारण बीमारियां हैं। जन्म संबंधी कुंडली में सूर्य का स्थान और स्थिति इन बीमारियों की ओर संकेत करते हैं। यहां तक कि कुंडली में सूर्य की स्थिति इन बीमारियों से ग्रस्त रहने की समय अवधि के बारे में जानकारी प्रदान करती है। यह जानकारी किसी ज्योतिषी की मदद से कुंडली के आकलन द्वारा प्राप्त की जा सकती है। सूर्य उपासना बेहद लाभदायक होती है। अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य कमज़ोर हो तो उस व्यक्ति के लिए सूर्य उपासना और भी जरूरी हो जाती है। ऐसे में उस व्यक्ति के लिए सूर्य की उपासना करना बेहद लाभदायक रहता है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!