ज्ञानेश्वर मुले के संस्मरण में कथा रिपोर्ताज की सी आभा नजर आती है- ओम निश्चल
दिल्ली की बसन्त ऋतु हमेशा ही मुझे उलझन में, असमंजस में डालती है. वह अचानक आती है; बिना कोई पूर्व सूचना दिए. वह चारों ओर दृष्टिपात करती है….. मानो सभी ओर उसका अपना ही साम्राज्य फैला हुआ हो. मजे की बात तो यह होती है कि कुछ समझें, इसके पहले ही यह साम्राज्य उसका हो जाता है. वह कण-कण में व्याप्त हो जाती है। नीम, पीपल के पेड़ पुराने पत्तों को त्यागकर नई कोंपलें ओढ़ लेते हैं.
दिल्ली की बसन्त ऋतु हमेशा ही मुझे उलझन में, असमंजस में डालती है. वह अचानक आती है; बिना कोई पूर्व सूचना दिए. वह चारों ओर दृष्टिपात करती है….. मानो सभी ओर उसका अपना ही साम्राज्य फैला हुआ हो. मजे की बात तो यह होती है कि कुछ समझें, इसके पहले ही यह साम्राज्य उसका हो जाता है. वह कण-कण में व्याप्त हो जाती है। नीम, पीपल के पेड़ पुराने पत्तों को त्यागकर नई कोंपलें ओढ़ लेते हैं.
